इस्तीफे

मनोज बनर्जी का लेख

नमस्कार दोस्तों बड़ी अजीब सी स्थिति है मैं कुछ दिन के लिए शहर से बाहर क्या गया, लखनऊ डिवीजन कोऑपरेटिव क्रेडिट सोसाइटी में मानो हाहाकार मच गया! सोसाइटी में इस्तीफे की हैट्रिक लग गई।
भाई क्यों ना हो! गुरु चेलो की धमा चौकड़ी देखकर ,दिल खट्टा हो जाता है ऐसी घिन भरी राजनीति से,इस्तीफा न हुआ हथियार बना लिया सहानुभूति पाने का,खुद को लाचार जताने के लिए कितना नीचे गिरेंगे,  इस्तीफा इस्तीफा खेलते रहे, अब चेले भी कहाँ पीछे रहने वाले हैं पर क्या कहूँ! गुरु तो गुड़ हो गए और चेले सारे के सारे शक्कर बन गए।
अब देखना यह है कि गुरु की राह चलकर चेले इस्तीफा वापस कब लेते हैं?
गुरु तो बेचारे इस्तीफा देते देते और वापस लेते-लेते तब तक नहीं थके जब तक धकिया कर बाहर नहीं कर दिए गए। अब देखना यह है कि चेले जो कोआपरेटिव में तांडव मचाए हुए हैं, थूक कर कब चाटते हैं? आखिर परंपरा को कायम भी तो रखना है समझ में यह नहीं आ रहा कि अंतरिम व्यवस्था में इस्तीफा देने की आवश्यकता आखिर पड़ी क्यों? मुझे तो लगता है कि चेलों ने सोचा हो पता नहीं दुबारा इस्तीफा देने का अवसर मिले ना मिले, इसलिए अभी इस्तीफा दे दो और गुरु की तरह इस्तीफा वापस ले लूं इस तरह परंपरा भी बनी रहेगी और गुरुजी भी प्रसन्न रहेंगे आखिर चेला धर्म भी तो निभाना है। अब जनता तो मूर्ख है जी जैसे चाहो उल्लू बना लो।
मैं पूरी दृढता से यह कहना चाहता हूं कि ये गुरु चेला को-आपरेटिव के साथ यह चुहा बिल्ली का खेल बंद कर दें………. वर्ना………. वर्ना………. यह पब्लिक है सब जानती है, मौका आने पर खुद सबक सिखा देगी।