दशहरे की शुभकामनाएं

नाभिकुण्ड पीयूष बस यांके ,
नाथ जीउत रावनु बल ताकें।।
असुभ होन लागे तब नाना ,
रोवहि खर सृकाल बहु स्वाना।।
बोलहिं खग जग आरति हेतु ,
प्रगट भये नभ जहं तह केतु।।
दिस दिस दोह होन अति लागा,
भयहु परब बिन रवि उपरागा।।
सायक एक नाभि सर सोषा,
अपर लगे भुज सिर करि रोषा।।
ले सर बाहू चले नाराचा,
सिर भुज हीन रुंड महि नाचा।।

विभीषण के बताते ही कि इसके नाभि में अमृत है और यह उसीके बल से जी रहा है , राम ने कराल बाण हाथ मे लिये। प्रभु के ऐसा करते ही सर्वत्र अशुभ सकुन होने लगे । गदहे ,सियार, कुत्ते रोने लगे , पक्षी अशुभ बोलने लगे , दशों दिशाओं में त्राहिमाम हो गया , सूर्य को बिना योग ही ग्रहण लग गया , मूर्तियां रोने लगी। प्रभु राम ने फिर एक ही बाण से उसके नाभिकुण्ड को शोख लिया तत्पश्चात उसके दसशीषों और भुजाओं को अन्य बाण से एक साथ काट डाला। सिरों और भुजाओं से रहित उसका धड़ तब पृथ्वी पर नाचने लगा।

विजयादशमी के पावन पर्व पर आपके समस्त दुर्गुणों पर आपके सदगुणों की विजय हो,आपके ज्ञान एवम सदगुणों का प्रकाश सर्वत्र फैले।यही प्रभु से प्रार्थना

आपको सपरिवार विजयादशमी की अनंत मंगलकामनाएं।